विविध धर्म गुरु >> श्री दसम ग्रन्थ साहिब 1 श्री दसम ग्रन्थ साहिब 1जोधसिंह
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इसमें श्री दसम ग्रन्थ साहिब की प्रथम सैंची का वर्णन है...
प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
प्रकाशकीय प्रस्तावना
नवीन संशोधित संस्करण
लोकप्रख्यात धर्मग्रन्थ ‘श्री गुरूग्रन्थ साहिब’ के
हिन्दी
अनुवाद सहित नागरी लिप्यन्तरण के प्रकाशन की योजना सफल सम्पूर्ण हुई। पावन
ग्रन्थ 3764 पृष्ठों और चार सैंचियों में प्रकाशित होकर हिन्दी जगत के
सम्मुख अवतीर्ण हुआ और जनता ने बड़ी उत्कण्ठा और भावावेश में उसका स्वागत
किया। इस सोल्लास प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित होकर हमने तत्काल श्री
दसमग्रन्थ साहिब के नागरी रूपान्तर की योजना बनायी और उसी के फलस्वरूप
श्री दसमग्रन्थ साहिब की यह प्रथम सैंची पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है।
शेष तीन सैंचियाँ मुद्रित हो रही हैं।
भुवन वाणी ट्रस्ट के ‘देवनागरी अक्षयवट’ की देशी-विदेशी प्रकाण्ड शाखाओं में संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी, कश्मीरी, गुरुमुखी, राजस्थानी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, कोंकणी मलयाळम, तमिल, कन्नड़ तेलुगु, ओड़िया, बँगला असमिया नेपाली, अंग्रेजी, हिब्रू, ग्रीक, अरामी आदि के वाङ्मय के अनेक अनुपम ग्रन्थ-प्रसून और किसलय खिल चुके हैं, अथवा खिल रहे हैं। इस नागरी अक्षयवट की गुरमुखी शाखा में प्रस्तुत यह ‘दसम ग्रन्थ साहिब’ ग्रन्थ तीसरा पल्लव-रत्न है।
भूमण्डल पर देश-काल-पात्र के प्रभाव से मानव जाति, विभिन्न लिपियाँ और भाषाएँ अपनाती रही है। उन सभी भाषाओं में अनेक दिव्य वाणियाँ अवतरित हैं, जो विश्वबन्धुत्व और परमात्मपरायणता का पथ-प्रदर्शन करती है; किन्तु उन लिपियों और भाषाओं से अपरिचित होने के कारण हम इस तथ्य को नहीं देख पाते। अपनी निजी लिपि और अपनी भाषा में ही सारा ज्ञान और सारी यथार्थता समाविष्ट मानकर, दूसरे भाषा-भाषियों को उस ज्ञान से रहित समझते हुए हम भेद-विभेद के भ्रमजाल में भ्रमित होते हैं।
भूमण्डल की बात तो दूर, हमारे अपने देश ‘भारत’ में ही अनेक भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित हैं। एक ब्राह्मी लिपि के मूल से उत्पन्न होने के बावजूद उन सबसे परिचित न होने के कारण हम अपने को परस्पर विघटित समझते हैं। सारी लिपियाँ और भाषाएँ सीखना- समझना सम्भव भी नहीं है।
सुतरां, यथासाध्य विश्व, और अनिवार्यतः स्वराष्ट्र की सभी भाषाओं के दिव्य वाङ्मय को राष्ट्र को सुलभ कराना, समस्त सदाचार-साहित्य-निधि को सारे देश की सम्पत्ति बनाना, यह संकल्प भगवान की प्रेरणा से सन् 1947 में मैंने अपनाया और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु 1969 ई. में ‘भुवन वाणी ट्रस्ट’ की स्थापना हुई। ‘श्रीगुरुग्रन्थ साहिब’ और प्रस्तुत ‘श्री दसम ग्रन्थ साहिब’ के हिन्दी अनुवाद सहित नागरी लिप्यन्तरण भी भाषाई सेतुबन्धु की इसी पुष्कल श्रृंखला की कड़ी हैं।
भुवन वाणी ट्रस्ट के ‘देवनागरी अक्षयवट’ की देशी-विदेशी प्रकाण्ड शाखाओं में संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी, कश्मीरी, गुरुमुखी, राजस्थानी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, कोंकणी मलयाळम, तमिल, कन्नड़ तेलुगु, ओड़िया, बँगला असमिया नेपाली, अंग्रेजी, हिब्रू, ग्रीक, अरामी आदि के वाङ्मय के अनेक अनुपम ग्रन्थ-प्रसून और किसलय खिल चुके हैं, अथवा खिल रहे हैं। इस नागरी अक्षयवट की गुरमुखी शाखा में प्रस्तुत यह ‘दसम ग्रन्थ साहिब’ ग्रन्थ तीसरा पल्लव-रत्न है।
भूमण्डल पर देश-काल-पात्र के प्रभाव से मानव जाति, विभिन्न लिपियाँ और भाषाएँ अपनाती रही है। उन सभी भाषाओं में अनेक दिव्य वाणियाँ अवतरित हैं, जो विश्वबन्धुत्व और परमात्मपरायणता का पथ-प्रदर्शन करती है; किन्तु उन लिपियों और भाषाओं से अपरिचित होने के कारण हम इस तथ्य को नहीं देख पाते। अपनी निजी लिपि और अपनी भाषा में ही सारा ज्ञान और सारी यथार्थता समाविष्ट मानकर, दूसरे भाषा-भाषियों को उस ज्ञान से रहित समझते हुए हम भेद-विभेद के भ्रमजाल में भ्रमित होते हैं।
भूमण्डल की बात तो दूर, हमारे अपने देश ‘भारत’ में ही अनेक भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित हैं। एक ब्राह्मी लिपि के मूल से उत्पन्न होने के बावजूद उन सबसे परिचित न होने के कारण हम अपने को परस्पर विघटित समझते हैं। सारी लिपियाँ और भाषाएँ सीखना- समझना सम्भव भी नहीं है।
सुतरां, यथासाध्य विश्व, और अनिवार्यतः स्वराष्ट्र की सभी भाषाओं के दिव्य वाङ्मय को राष्ट्र को सुलभ कराना, समस्त सदाचार-साहित्य-निधि को सारे देश की सम्पत्ति बनाना, यह संकल्प भगवान की प्रेरणा से सन् 1947 में मैंने अपनाया और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु 1969 ई. में ‘भुवन वाणी ट्रस्ट’ की स्थापना हुई। ‘श्रीगुरुग्रन्थ साहिब’ और प्रस्तुत ‘श्री दसम ग्रन्थ साहिब’ के हिन्दी अनुवाद सहित नागरी लिप्यन्तरण भी भाषाई सेतुबन्धु की इसी पुष्कल श्रृंखला की कड़ी हैं।
आदि ग्रन्थ तथा दसम ग्रन्थ की भाषा
आदि श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब कि लिपि गुरमुखी है। गुरमुखी-देवनागरी वर्णमाला
चार्ट से स्पष्ट है कि गुरमुखी अक्षर प्रायः नागरी अनुरूप हैं और सामान्य
ध्यान रखने पर गुरमुखी और हिन्दी-भाषा परस्पर दोनों लिपियों का सरलता से
पाठ कर सकते हैं। ग्रन्थ की गुरुवाणियाँ अधिकांश पंजाब प्रदेश में अवतरित
हैं और इस कारण जन-साधारण उनकी भाषा को पंजाबी के सदृश अनुमान
करता
है; जबकि ऐसी बात नहीं है। श्री गुरुग्रन्थ साहिब की भाषा आधुनिक पंजाबी
भाषा की उपेक्षा हिन्दी भाषा के अधिक समीप है और हिन्दी-भाषी को पंजाबी
–भाषी की उपेक्षा गुरु-वाणियों का आशय अधिक बोधगम्य
है। दूसरी
ओर यद्यपि श्री दसम ग्रन्थ की भी लिपि गुरमुखी है, परन्तु इसकी भाषा
प्रायः अपभ्रंश हिन्दी में कविताबाद्ध है। इसकी भाषा पंजाबी-भाषियों के
लिये और अधिक दुरूह किन्तु हिन्दी-भाषियों के लिये भलीभाँति जानी-पहचानी।
एक और भ्रम !
दूसरी भ्रान्ति है कि सामान्यजन समझते हैं कि ये
‘गुरुग्रन्थ’
सिक्ख- पंथ-मात्र के धर्मग्रन्थ हैं, उनमें सिक्ख अनुयायियों के लिये ही
विधी-निषेध वर्णित होंगे जबकि तथ्य यह नहीं है। अलबत्ता यह सही है कि संकट
और त्रास के युग में एक संत्रस्त मानव-समूह इन वाणियों के बल पर संगठित
हुआ है और अपूर्व उत्सर्ग एवं बलिदान द्वारा उसने समाज को परित्राण
दिलाया। परन्तु दिव्य गुरुवाणियों में किसी वर्ग-विशेष पक्ष-विपक्ष,
शत्रु-मित्र, की झलक नहीं मिलती। सामाजिक एवं धार्मिक आडम्बरों से
बन्धमुक्त करते हुए, शाश्वत सदाचार और सद् विचार के द्वारा गुरुचिन्तन
आत्म-परमात्मा-चिन्तन और मिलन की ओर मानव मात्र को उन्मुख किया गया है।
कहीं यह ग्रन्थ भी नहीं मिलता कि कौन उत्पीड़ित है, कौन उत्पीड़क। मानवीय
दुर्बलताओं और दुर्वासनाओँ को ही शत्रु मानकर साक्षात् ईश्वरस्वरूप गुरु
की कृपा से उनसे स्वतः त्राण, और अन्ततः आवागमन से मुक्ति पाने का नाद
ग्रन्थ वाणियों में ओतप्रोत है।
गुरमुखी में प्राप्त ऐसे सार्वभौम दिव्य गन्थों के अनुवाद पंजाबी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में भले ही हुए हैं, किन्तु आम जनता को बोधगम्य हिन्दी टीका उपलब्ध नहीं है। ग्रन्थ साहिब के आंशिक हिन्दीं भाष्य तो देखने को मिले; परमानन्द उदासी द्वारा श्री जपुजी की विशद व्याख्या, एवं कई अन्य टीकाएँ भी। किन्तु एक तो वे टीकाएं समग्र ग्रन्थ की नहीं हैं, आंशिक हैं, दूसरे वे व्याख्याएँ विस्तार में है, और विद्धानों के लिए ही अधिक उपयुक्त है। जनसाधारण की सहज पैठ उनमें सम्भव नहीं। इस विचार से प्रेरित होकर ही श्री गुरुग्रन्थसाहिब एवं श्री दसमग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद सहित नागरी लिप्यन्तरण सामान्य जनता के कल्याणार्थ प्रस्तुत करना आवश्यक प्रतीत हुआ।
गुरमुखी में प्राप्त ऐसे सार्वभौम दिव्य गन्थों के अनुवाद पंजाबी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में भले ही हुए हैं, किन्तु आम जनता को बोधगम्य हिन्दी टीका उपलब्ध नहीं है। ग्रन्थ साहिब के आंशिक हिन्दीं भाष्य तो देखने को मिले; परमानन्द उदासी द्वारा श्री जपुजी की विशद व्याख्या, एवं कई अन्य टीकाएँ भी। किन्तु एक तो वे टीकाएं समग्र ग्रन्थ की नहीं हैं, आंशिक हैं, दूसरे वे व्याख्याएँ विस्तार में है, और विद्धानों के लिए ही अधिक उपयुक्त है। जनसाधारण की सहज पैठ उनमें सम्भव नहीं। इस विचार से प्रेरित होकर ही श्री गुरुग्रन्थसाहिब एवं श्री दसमग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद सहित नागरी लिप्यन्तरण सामान्य जनता के कल्याणार्थ प्रस्तुत करना आवश्यक प्रतीत हुआ।
आदि श्री गुरुग्रन्थ साहिब का हिन्दी अनुवाद
वाणी और भाव, दोनों का सही निर्वाह करते हुए अनुवाद का कार्य सरल नहीं था।
हिन्दी और गुरमुखी, दोनों भाषाओं में पर्याप्त गति, भावग्रह्यता
और
दर्शन के प्रति सहज निष्ठा, इन सबकी जरूरत थी। इसी खोज के दौरान डा०
मनमोहन सहगल एम.ए, पीएच.डी. डी लिट्, हिन्दी विभागाध्यक्ष पंजाबी
विश्वविद्यालय पटियाला से साक्षात हुआ। ट्रस्ट के पुनीत और गुरुतर कार्य
पर प्रसन्न होकर उन्होंने बड़े निस्पृह भाव से इस गहन कार्य को सम्हाला।
उन्हीं के योगदान से आदिग्रन्थ का सम्पूर्ण हिन्दी संस्करण
पाठकों
के समक्ष प्रस्तुत हो सका। राष्ट्रभाषा में यह एक बड़े अभाव की
पूर्ति हुई।
श्रीदसम ग्रन्थ साहिब का प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद
भुवन वाणी ट्रस्ट के भाषाई सेतु-बन्धन कार्य की यह परम्परा है कि जैसे ही
किसी भाषा का एक सानुवाद लिप्यन्तरित अनुपम ग्रन्थ प्रकाश में आता है,
बिना विराम उस भाषा के दूसरे ग्रन्थ का प्रकाशन आरम्भ हो जाता है। सुतराँ
गुरुग्रन्थ साहिब जैसे विशाल पुनीत ग्रन्थ के अन्तिम (चौथी) सैंची का
मुद्रण समाप्ति के समीप पहुँचते ही, यह उत्कण्ठा थी कि गुरुमुखी का अब कौन
अन्य श्रेष्ठ ग्रन्थ आरम्भ किया जाय।
ध्यान श्री दसम ग्रन्थ साहिब की ओर पहले से था। यह ग्रन्थ भी, आदि गुरुग्रन्थ साहिब की भाँति उतने ही पृष्ठों में पूर्ण हैं। वहीं आकर वहीं चार सैंची और लगभग उतने ही पृष्ठ सम्भावित हैं। इस ग्रन्थ के प्रणेता श्री गुरुगोविन्द सिंह को देश-विदेश में कौन नहीं जानता ? भारत में तो बच्चा-बच्चा उनके शौर्य और अद्वितीय बलिदान से परिचित है।
संयोग से सुपात्र विद्वान् डॉ. जोधसिंह, एम. ए,. पीएच् डी., प्रोफेसर हिन्दू विश्वविद्यालय; पटियाला, से परिचय हुआ। (अभी ताजा समाचार मिला है कि पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में सिक्ख-दर्शन-विभाग में रीडर के पद पर नियुक्त उन्होंने स्वीकार की है।) अस्तु उन्होंने श्री दशम ग्रन्थ साहिब के हिन्दी अनुवाद का कार्य-भार सम्भाला। उनके ही निस्पृह-भाव से किये गये श्रम के फलस्वरूप यह प्रथम सैंची हिन्दी जगत के सम्मुख आज इतना शीघ्र प्रस्तुत है। शेष सैंचियाँ यथाशीघ्र क्रमशः प्रकाशित होती जायँगी। श्री दसम ग्रन्थ साहिब के कुछ अंशों के सम्बन्ध में समाज में कुछ मतभेद भी हैं। विद्वान् अनुवादक ने अपनी भूमिका में उनका बड़ी योग्यता से समन्वय किया है।
ध्यान श्री दसम ग्रन्थ साहिब की ओर पहले से था। यह ग्रन्थ भी, आदि गुरुग्रन्थ साहिब की भाँति उतने ही पृष्ठों में पूर्ण हैं। वहीं आकर वहीं चार सैंची और लगभग उतने ही पृष्ठ सम्भावित हैं। इस ग्रन्थ के प्रणेता श्री गुरुगोविन्द सिंह को देश-विदेश में कौन नहीं जानता ? भारत में तो बच्चा-बच्चा उनके शौर्य और अद्वितीय बलिदान से परिचित है।
संयोग से सुपात्र विद्वान् डॉ. जोधसिंह, एम. ए,. पीएच् डी., प्रोफेसर हिन्दू विश्वविद्यालय; पटियाला, से परिचय हुआ। (अभी ताजा समाचार मिला है कि पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में सिक्ख-दर्शन-विभाग में रीडर के पद पर नियुक्त उन्होंने स्वीकार की है।) अस्तु उन्होंने श्री दशम ग्रन्थ साहिब के हिन्दी अनुवाद का कार्य-भार सम्भाला। उनके ही निस्पृह-भाव से किये गये श्रम के फलस्वरूप यह प्रथम सैंची हिन्दी जगत के सम्मुख आज इतना शीघ्र प्रस्तुत है। शेष सैंचियाँ यथाशीघ्र क्रमशः प्रकाशित होती जायँगी। श्री दसम ग्रन्थ साहिब के कुछ अंशों के सम्बन्ध में समाज में कुछ मतभेद भी हैं। विद्वान् अनुवादक ने अपनी भूमिका में उनका बड़ी योग्यता से समन्वय किया है।
नागरी लिप्यन्तरण
गुरुमुखी पाठ को यथावत शुद्ध रूप में नागरी लिपि में प्रस्तुत करने के
लिये प्रकाशित अब तक के उपलब्ध नागरी लिप्यन्तरणों को हमने आरम्भ में
आधार बनाया। किन्तु श्री गुरुग्रन्थ साहिब के गुरमुखी संस्करण
से
मिलान करने पर विदित हुआ कि नागरी लिपि में रूपान्तरित करते समय
शब्दों को हिन्दी और संस्कृति के समीप पहुँचाने का यत्न किया है; जबकि
(गुरुमुखी पाठ को) केवल नागरी अक्षरों में यथावत् लिख देना चाहिए था।
सभी भारतीय भाषाओं में संस्कृति तत्सम और तद्भव शब्दों का अमित भण्डार है; सुतरां, गुरमुखी में और श्री गुरुग्रन्थ साहिब की (गुरुमुखी) भाषा में भी संस्कृत से उद्भूत तद्भव शब्दों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। ज्ञातव्य है मूल पोथी के लेख की आर्ष पवित्रता को चिरस्थायी रखने के लिये आदि पोथी में यदि कोई शुद्ध शब्द प्रमादवश लिख गया है तो आज भी लाखों प्रतियाँ छप जाने पर भी उन अशुद्धियों को संशोधित रूप में लिखना असामान्य समझा गया। उदाहरण के लिए यदि लेख में ‘ओही’ ‘गोबिंद’ ‘गोपालु’ आदि लिख गये हैं तो उनको आर्ष होने के नाते पूज्य शाश्वत मानकर जैसे का तैसा ही लिखा जा रहा है; उनको अगले छापों में क्रमशः ‘ओही’ ‘गोविन्द’ गोपाल’ नहीं संशोधित किया गया।
सभी भारतीय भाषाओं में संस्कृति तत्सम और तद्भव शब्दों का अमित भण्डार है; सुतरां, गुरमुखी में और श्री गुरुग्रन्थ साहिब की (गुरुमुखी) भाषा में भी संस्कृत से उद्भूत तद्भव शब्दों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। ज्ञातव्य है मूल पोथी के लेख की आर्ष पवित्रता को चिरस्थायी रखने के लिये आदि पोथी में यदि कोई शुद्ध शब्द प्रमादवश लिख गया है तो आज भी लाखों प्रतियाँ छप जाने पर भी उन अशुद्धियों को संशोधित रूप में लिखना असामान्य समझा गया। उदाहरण के लिए यदि लेख में ‘ओही’ ‘गोबिंद’ ‘गोपालु’ आदि लिख गये हैं तो उनको आर्ष होने के नाते पूज्य शाश्वत मानकर जैसे का तैसा ही लिखा जा रहा है; उनको अगले छापों में क्रमशः ‘ओही’ ‘गोविन्द’ गोपाल’ नहीं संशोधित किया गया।
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